A blog dedicated to campaign for the safe recovery and Justice for Navaruna Chakravarty, a 12 year old girl, who was kidnapped from posh area of Muzaffarpur, Bihar, on 18th September,2012. She is yet untraced. Please support and do something for safe recovery of Navruna. For any query, contact us at savenavaruna@gmail.com or 09717167232
Friday, 15 February 2013
Sunday, 10 February 2013
Tuesday, 5 February 2013
दरिंदों के कब्जे में इंसानियत
नवरुणा अपहरण: संघर्ष के 100 दिन
संघर्ष का अपना एक
अलग ही स्वतंत्र अस्तित्व है। संघर्ष तमाम मुसीबतों को झेलते हुए जीवन जीने
की हो या बिन बुलाई मुसीबतों से बचने के लिए किया गया हो,, यह हमेशा एक विशेष
प्रकार की अनुभूति से परिचित कराता है। संघर्ष का भी अपना एक अलग रंग है,
अलग अंदाज है। कुछ अपने लिए, कुछ अपनों के लिए और कुछ अपना समझने वालों के
लिए। यह कम, ज्यादा प्रत्येक मनुष्य के जीवन का हिस्सा बन जाता है या बना
दिया जाता है। अमूमन अफ़सोस और संघर्ष का कोई रिश्ता नहीं होता
लेकिन नवरुणा अपहरण के केस में न्याय पाने को किये गए पिछले 100 दिनों
के संघर्ष ने जीवन में अफ़सोस व संघर्ष का ऐसा घालमेल किया है कि स्वभाव से
हमेशा "बचकर निकलने वाला" मिजाज सच पूछिए तो अब विद्रोही हो गया है।
वह मिजाज जो डरता नही है, लड़ता है और लड़ने को प्रेरित करता है। लेकिन इस
संघर्ष में लड़ाई अपनो से ही है, यह देखकर पीड़ा भी होती है, अफ़सोस भी।
अपनों से बिछुड़कर जीने की पीड़ा क्या होती है, हम बखूबी जानते है लेकिन
अपनों को खोने की डर के साए में पिछले 143 दिनों से जी रहे नवरुणा के
माँ-बाप-बहन-चाचा-चाची-चचेरे भाई सहित सभी रिश्तेदारों के कष्ट हम रत्तीभर
नहीं महसूस कर सकते। कितना दुःख झेला होगा, वियोग में कितने आंसू बहाए
होंगे! तमाम सहयोग करने के बावजूद असहयोग का आरोप लगने पर कैसी पीड़ा महसूस
होती होगी, यह सोचकर भी असहज हो जाते है हम। अगर नवरुणा के परिजनों का
राज्य सरकार और वहां की पुलिस पर से भरोसा उठ गया है तो कोई हमें
बताएं, इसमें उन्होंने कौन सा अपराध किया है!
यह स्थिति केवल किसी व्यक्ति विशेष का नहीं है
बल्कि "सेव नवरुणा कैम्पेन" के सभी अहम सहयोगी सहित देशभर में फैले सैंकड़ों
शुभचिंतकों का है, जिनका मन इस असंवेदनशील, असहिंष्णु व्यवस्था से खिन्न हो
चूका है। उनका जीवन के सुरक्षा की गारंटी देनेवाले संस्थाओं पर से विश्वास
डिगने लगा है। जीवन जीने और बोलने की स्वतंत्रता व सुरक्षा से सम्बंधित
देशव्यापी चिंता के मद्देनजर, ऐसी दुखद स्थिति में यह बात और परेशान कर दे
रही है कि कैसे जी पाएंगे इन परिस्थितियों में, जहाँ न्याय पाने के लिए किए
जा रहे संघर्ष में न्याय मिलना तो दूर, न्याय मिलने की दिलाशा भी नहीं
मिलती। उलटे धमकियाँ मिलती है। परेशानी सहनी पड़ती है। भरोसा, कभी न पूरा
होनेवाले वादों से टकराकर, टूटकर, बिखर सा जाता है। लेकिन तत्क्षण एक आवाज
आती है अन्दर से कि फिर बिना भरोसे की इस दुनिया में डर-डर के जीना भी क्या
जीना! लड़ो! अंतिम दम तक लड़ो! लड़ते लड़ते न्याय छीन सकों तो छीन लो, या फिर
कभी न खत्म होनेवाली लड़ाई में लीन होकर दुनिया के इस रंगमंच से विलीन हो
जाओ! आज किसी और के साथ हुआ, कल तुम्हारे साथ होगा तो क्या तुम शांत बैठ जाओगे? अगर नहीं तो फिर अपना समझकर इस लड़ाई को अंजाम तक पहुचाएं बिना हार मत मानो। अगर जबाब हाँ में तो फिर इस लड़ाई की शुरुआत क्यों किया था, जब इसे अंजाम तक पहुँचाएं बगैर छोड़ देना था। न्याय अधूरी रही तो अपने को काफी माफ़ नहीं कर पाओगे। लोग ताना देंगे, गलियां भी सुनाएंगे।
नवरुणा मामले में देश की जिम्मेदार संस्थाओं की स्थापना
के उदेश्यों के संबंध में लिखे बड़े बड़े दावें, ऐसे धराशायी होते दिखे,
मानो अबतक रुई के ढेर को ही पहाड़ समझ बैठने की भूल कर बैठा था। एक संस्था
ने तो सब्र करने की हदें पार कर दी। एक ऑफिस से बगल के दुसरे ऑफिस में
अपहरण जैसे मामले की चिठ्ठी जाने में पुरे एक महीने लगे। वह भी तब, जब कम
से कम 10 बार फ़ोन किया गया, जल्द करवाई करने की गुहार लगाई गई, परिजनों के
दर्द की दुहाई दी गई। पुलिस और सरकार के व्यवहार-चरित्र, जो अबतक सफ़ेद परत
के तले छिपा था, उसके क्रूर चेहरा का नजारा देखने को मिला तो हर दम खबरों के पीछे मानवीयता को पीछे छोड़ने वाले मीडिया के भी अलग-अलग रंग दिखे।
पुलिस, सरकार, मीडिया की मज़बूरी तो फिर भी समझ में आती है, नवरुणा
के मामले में सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्थाओं ने भी काफी निराश किया। समाज
के ठेकेदारों की असली तस्वीर दिखाई दी। नवरुणा को लेकर चुप्पी से असल में "सामाजिक जिम्मेवारी" शब्द का चीरहरण होते दिखा। ऐसा नहीं था कि सेव नवरुणा
कैम्पेन से जुड़े लोगों के व्यक्तिगत जीवन सामाजिक, राजनीतिक संस्थाओं से
अछूते रहे हो और यह जीवन में कोई पहला दुर्भाग्यजनक घटना दिखाई पड़ी हो।
लेकिन नवरुणा की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाना क्या सामाजिक, राजनीतिक
संस्थाओं की ही बपौती थी। ऐसी घटना आज नवरुणा के साथ हुई , कल किसी और के
साथ भी हो सकती है। क्या शहर में रहनेवाले लोगो में से किसी की व्यक्तिगत
स्तर पर जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वह नवरुणा को घर लौटाने की मांग प्रभावशाली तरीके से करता ?
आम आदमी के हैसियत से कोई और यह सवाल पूछने की हिम्मत नहीं दिखा सकता था
कि नवरुणा कहाँ है और उसको अबतक क्यूँ नहीं ढूंढा गया ? कारण कुछ भी हो, इस
शर्मनाक घटना के जिम्मेवार कोई भी हो, उस बच्ची की जान बचने चाहिए। लेकिन
ऐसा अबतक होता नही दिखा।
देश में
अनेको अपहरण की घटनाएँ होती रहती है। हत्या, लुट, बलात्कार जैसी वारदातों
की फेहरिस्त प्रतिदिन लम्बी होती जा रही है। लेकिन देश में कुछ मामले ऐसे
भी देखने को मिलते है, जहाँ लगता है कि इंसानियत दरिंदों के कब्जे में चली
गयी है। कानून का राज, अपराधियों के साम्राज्य को बचाने में जुटी दिखाई
पड़ती है। नवरुणा के मामले में भी शुरुआत से यही तस्वीर दिखाई पड़ी। पुलिस,
सरकार की भूमिका सदैव संदिग्ध रही। कभी न सुना था, न कभी सोचा था कि सुशासन
राज में पुलिसिया सोच की हद इतने घृणित स्तर तक पहुँच जाएगी कि वह 12 साल
की बच्ची के अपहरण को प्रेम प्रसंग के रंग में रंग देगी। बेटी के चरित्र
पर लांक्षण लगाकर, बेटी के गम में घुट-घुटकर जी रहे बाप की पीड़ा और माँ के
आंसू को छलने का काम करेगी ! सरकार इतनी असंवेदनशील, निर्दयी हो जाएगी कि
बेटी की याद में बिलख-बिलख कर दिन रात रोनेवाली माँ के हाथों से ज्ञापन लेना तो
दूर, झूठी दिलासा भी नहीं देगी और उलटे ज्ञापन भी फड़वा देगी।
कौन जानता था, कौन है नवरुणा! क्या गुजरी होगी उसपर, जब दरिंदे उसे उठा
कर लें गए होंगे घर से। यह सोचकर शारीर का रोम-रोम सिहर जाता है। हम जितने
भी विद्यार्थी सेव नवरुणा से सम्बंधित है, किसी ने भी नवरुणा को कभी नहीं
देखा। स्वयं मुजफ्फरपुर में जीवन के तक़रीबन 6 वर्ष बिताने के बाबजूद
कभी नवरुणा की गली से नहीं गुजरा, मिलने की बात तो दूर रही। लेकिन इंसानियत
के नाते जब लोकतान्त्रिक मर्यादा में रहकर, पुलिसिया उदासीनता के विरोध
में बिगुल 28 अक्टूबर, 2012 को नार्थ कैम्पस से फूंका गया तो न केवल
पुलिस होश में आई बल्कि उसी जोश में दिल्ली धमकाने भी आ धमकी। खैर
मुजफ्फरपुर से लेकर दिल्ली तक उठी आवाज ने पुलिस को यह विवश किया कि
वह मामले को अपहरण माने लेकिन बाद के दिनों में जिस तरीके से इस केस में
प्रगति हुई, उसने और भी शंका पैदा की। आज स्थिति यह है कि एक षड्यंत्र के
तहत नवरुणा के घर के समीप बरामद कंकाल की आड़ में, ऐसा जाल बुना जा रहा है,
जिसमे फंसकर नवरुणा की जिन्दगी रह गई है। मेडिकल टेस्ट के नामपर आम जनता के
ध्यान भटकाने की साजिश रची जा रही है ताकि कोई यह पूछने वाला न रहे कि
आखिर नवरुणा कहाँ है?
बचपन से
सुनता आया था कि मुजफ्फरपुर की धरती जुब्बा सहनी, खुदीराम बोस
जैसे क्रांतिकारियों, सामाजिक रूप से जागरूक लोगों की धरती रही है। अनेक
क्रांतियों, सामाजिक आन्दोलनों के बीज तिरहुत की इस धरती पर बोए गए जो देश
में मिसाल बना। लेकिन नवरुणा के मामले में क्रांतिकारियों की धरती पर
लोकतान्त्रिक तरीके से एक बेटी के लिए आवाज भी ढंग से नहीं उठी। दिल्ली की
दामिनी के लिए आंसू बहाने वाले तथाकथित समाज के जागरूक, प्रबुद्ध लोग
नवरुणा का नाम लेने से भी कतराते रहे। क्या सिर्फ इसलिए कि नवरुणा के नामपर
उनका नाम अगले दिन अख़बारों में नहीं छपता या सिर्फ इसलिए कि नवरुणा का यह
दोष है कि वह तथाकथित रूप से बिहार के इस प्रबुद्ध, समृद्ध शहर में किसी के
जाती की नहीं थी। राजनीतिक वर्ग क्या सिर्फ इसलिए शांत रहा क्यूंकि बंगाली मूल की नवरुणा उनके वोट बैंक का हिस्सा नहीं बन सकती थी? हमें यह कहने में कोई संकोच नही है कि जिस धरती ने पूरी
दुनिया को लोकतंत्र दिया, वही पर लोकतान्त्रिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ती
रही और लोग तमाशबीन बने रहे। यही वह कायरता है जिसने बिहार के नसीब में
दशकों से बदनामी की गठरी ढ़ोने को मजबूर किया है।
यह तो समय
बताएगा कि आखिर नवरुणा के सुरक्षित घर वापसी हेतु लगाया गया दिमाग,
महत्वपूर्ण समय और विद्यार्थी जीवन की जरूरतों में कटौती कर लगाई गई छोटी
सी राशी, देश की एक बेटी को बचाने व उसे न्याय दिला पाने के काम आ पाई या
नहीं, लेकिन इतना जरुर है कि सब चेहरे बेनकाब हुए है, जो अब तक
सफेदपोश दिखे, समझे जाते रहे है। संयुक्त राष्ट्र संघ को छोड़कर भारत की सभी
जिम्मेवार संस्थाओं में गुहार लगाने वाले छात्र थके तो नहीं लेकिन कुछ हद
तक हताश जरुर हो गए है। ईमानदारी से कहे तो अब तक सम्मान के हक़दार समझी
जानेवाली कई संस्थाएं कम से कम सेव नवरुणा कैम्पेन चलाने वाले हम छात्रों
की नजर में अब सम्मानित नही रहे।
नवरुणा के मसले पर लॉ फैकल्टी, दिल्ली विश्वविद्यालय व मुजफ्फरपुर से किसी न किसी रूप में जुड़े दोस्तों
व शुभचिंतकों ने जिस तरीके से भावनाओं के स्तर पर हमलोगों का हौसला बढ़ाने से
लेकर, उचित सलाह देने तक में जिस प्रकार की तत्परता दिखाई, वह अपने आप में
अतुलनीय है। शायद उनके मदद के बगैर 100 दिनों की यह यात्रा पूरी नहीं हो
पाती, हमलोग कुछ कर भी नहीं पाते। वैसे तो हम सबने ज्यादा कुछ नही किया नवरुणा को लेकर, फिर भी उम्मीद
है, यह छोटा सा संघर्ष व्यर्थ नहीं जाएगा। डर बस इसी बात का रहता है कि
न्याय की यह लड़ाई अपने मुकाम तक पहुंचे बिना कही ठहर न जाएँ। वह भरोसा
न टूट जाए जिसे लेकर सेव नवरुणा की आवाज बुलंद की गई थी, बिना किसी समर्थन,
सहयोग और सामर्थ्य के! आस्तिक होने के नाते ईश्वर पर अटूट विश्वास है कि
सबकी कोसिस, दुआएं बेकार नहीं जाएगी। हमारी आवाज जरुर नवरुणा के
अपहरणकर्ताओं तक पहुंचेगी, उनका कलेजा पसीजेगा और नवरुणा अपने घर,
सबको रुलाकर ही सही, लौट आएगी।
अंतिम में नीरज जी के इन शब्दों से मन को दिलाशा देते हुए;
मेरे सृजन हताश न हो,
दनुज थकेगा, मनुज चलेगा, मेरे देश उदास न हो।
फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा।
मेरे सृजन हताश न हो,
दनुज थकेगा, मनुज चलेगा, मेरे देश उदास न हो।
फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा।
Thursday, 31 January 2013
कंकाल के मायाजाल में फंसी नवरुणा अपहरण कांड की गुत्थी
डीएनए टेस्ट के नामपर लोगो को बरगलाने में लगी है पुलिस,
अपहरण कांड को दबाना चाहती है बिहार सरकार
18
सितम्बर, 2012 को मुजफ्फरपुर शहर से नवरुणा के अपहरण हुए 135 दिन हो गए,
लेकिन अबतक उसका पता नही चल पाया है। 7वी कक्षा में पढनेवाली बंगाली मूल
की 12 वर्षीय नवरुणा की सुरक्षित घर वापसी हेतु राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री,
मुख्यमंत्री से लेकर मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग
सहित सुप्रीम कोर्ट तक में गुहार लगाई जा चुकी है। तमाम पुलिसिया आश्वासनों
के बावजूद नतीजा शून्य है। दुर्भाग्य तो यह है कि सुशासन की पुलिस एक
सुराग तक ढूंढ़ नहीं पाई है। इसी बीच तक़रीबन 67 दिन बीतने के बाद 26
नवंबर, 2012 को अचानक इस अपहरण कांड में एक नया मोड़ आ जाता है और नाटकीय
अंदाज में नवरुणा के घर के समीप एक कंकाल बरामद हो जाती है। पहले प्रेम
प्रसंग, फिर दबाब बढ़ने पर अपहरण की बात करने वाली पुलिस एकाएक नवरुणा के
घर के समीप मिले कंकाल को नवरुणा का होने की बात को लेकर इतना ज्यादा
सक्रिय हो जाती है कि अनुसन्धान का मतलब सिर्फ मेडिकल टेस्ट हो जाता है।
प्रतिदिन बेटी की बरामदगी के वादे करनेवाले पुलिस अधिकारी इस कंकाल के
मिलने के बाद चुप्पी साध लेते है। आज स्थिति यह है कि हर तरफ नवरुणा केस का
जिक्र आते ही ""डीएनए टेस्ट परिजन क्यों नहीं दे रहे है"" के सवाल गूंज
रहे है। मर्यादित रूप से सवाल उठाना, लोकतांत्रिक विचारो की अभिव्यक्ति का
ही एक रूप है जो न्यायसंगत भी है और जरुरी भी। लेकिन सवाल उठाने के नामपर
पुरे प्रकरण को एक गलत दिशा देना सर्वथा अनुचित है। शायद नवरुणा का अपहरण
करनेवाले व अपहरण के षड्यंत्रकर्ता भी यही चाहते है कि अपहरण की बात भूलकर
लोग इधर उधर की बातों में उलझे रहे।
इससे
पहले की और कुछ कहा जाए पुरे मसले को समझना बहुत जरुरी है। हुआ यूँ
कि जवाहरलाल रोड स्थित नवरुणा के घर के पास की नाली की सफाई के दौरान 26
नवंबर को एक कंकाल दो थैलीयो में बरामद हुआ। बहुत कम चौड़ी नाली में मिली
इस कंकाल ने अचानक पुरे अनुसन्धान की दिशा मोड़ दी। कंकाल के
प्रत्यक्षदर्शियों ने इसे किसी व्यस्क का माना। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक,
एसएसपी ने भी इस बात को स्वीकार किया था कि कंकाल किसी बड़े व्यक्ति का
है।(http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-11-27/patna/35386850_1_human-skeleton-gunny-bag-drain) इसी नाली से दो दिनों बाद एक कटी हुई हाथ के टुकड़े, खून के धब्बे
मिले। अज्ञात के विरुद्ध दफा 302 के तहत मुकदमा ( न. 640/12, दिनांक-26.11.2012)
दर्ज हुआ। नवरुणा के पिता को एसएसपी ने कंकाल की जब तस्वीरे दिखाई तब
उन्होंने इसे अपनी बेटी का होने से पूरी तरह इंकार किया और इसे साजिश के
तहत की गई करतूत बतलाया। कंकाल मिलने के समय कुछ लोगो ने यह भी कहा कि यह
शहर में मधुबनी कांड की तरह आग लगाने के लिए रचे गए षड़यंत्र का हिस्सा था
लेकिन मुजफ्फरपुर के लोगो ने धैर्य का परिचय दिया और शहर में शांति बनी
रही ।
कंकाल
के मिलने के बाद अचानक नवरुणा को ढूंढ़ निकालने के वादे करनेवाले पुलिस
अधिकारीयों का रुख ही बदल गया। सब कंकाल के पीछे पड़ गए। हद तो तब हो गयी
जब कंकाल मिलते ही अप्रत्यक्ष तरीके से यह मान लिया गया कि यह नवरुणा का ही
है। यहाँ तक कि भारत का यह पहला मामला होगा जहाँ कंकाल घर के समीप
बरामद होते ही पुलिस डीएनए टेस्ट के लिए सैम्पल लेने के लिए दबाब बनाना
शुरू कर दी। सवाल उठता है कि कंकाल के सम्बन्ध में कुछ जानकारी,
जैसे उम्र, लिंग, हत्या की अनुमानित तिथि आदि की जानकारी बगैर कैसे पुलिस
टेस्ट के लिए कह सकती थी जबकि अभीतक फोरेंसिक जाँच की रिपोर्ट भी नहीं आई
थी। इस बात की पुष्टि एसएसपी द्वारा प्रभात खबर को 30 नवंबर को दिए इस
इंटरव्यू से भी होती है, जिसमे टेस्ट लेने के लिए कोर्ट का आदेश लेने की
बात एसएसपी राजेश कुमार ने कही थी।
इसके
अलावा यह भी सुनने में आया है कि कंकाल के साथ बरामद खोपड़ी देखने से लगभग
एक वर्ष पुराना लगता था। अगर उसमे से मिटटी निकाला जाता तो तक़रीबन आधे
किलो मिटटी के अंश पाए जाते।
कंकाल मामले
में एक नया मोड़ तब आया जब प्रभात खबर में छपी रिपोर्ट ने इस बात पर मुहर
लगाने का काम किया कि कंकाल नवरुणा का नही है बल्कि 30-40 साल के किसी
व्यस्क का है । सूत्रों के हवाले से 2 दिसंबर, 2012 को छपी अख़बार के पहले
पृष्ठ की इस पहली खबर में यह दावा किया गया था कि कंकाल 30 से 40 साल के
किसी व्यक्ति का है। यह खबर 2 बार छपी।
ऐसे
में यह सवाल उठाना क्या गलत होगा कि जो तथाकथित फोरेंसिक जाँच की रिपोर्ट
गोपनीय तरीके से ही सही सार्वजनिक हुई है, वह गलत है, झूठी है ? अगर प्रभात
खबर में छपी खबर झूठी थी तो दो सवाल उठते है; पहला, क्या ऐसे संवेदनशील
मामलो में कोई अख़बार अपनी लीडिंग स्टोरी बिना किसी तथ्य के छाप सकता है ?
दूसरा, पुलिस ने इसका खंडन क्यों नहीं किया?
इस
प्रकार देखा जाए तो लगता है कि सुनुयोजित तरीके से इस अपहरण कांड की पूरी
स्क्रिप्ट पहले ही रची जा चुकी थी जिसका एकमात्र मकसद महज ज़मीन के लिए
इंसानियत को गिरवी रखना था।
पुरे प्रकरण को लेकर मन में कुछ सवाल बार बार उठता है कि-
पुरे प्रकरण को लेकर मन में कुछ सवाल बार बार उठता है कि-
(1)
नवरुणा के घर के समीप मिले कंकाल और फोरेंसिक जाँच को भेजी गयी कंकाल क्या
एक थे या अलग अलग ? क्यूंकि कंकाल के प्रत्यक्षदर्शी कंकाल के किसी बड़े
व्यक्ति का होने की बात कह रहे थे, जिसकी पुष्टि स्थानीय अखबारों ने भी की
है।
(2)
निदान, जिसके जिम्मे शहर की सफाई है, के कर्मचारी इतने सुबह किसके कहने पर
उसके घर के पास सफाई करने पहुंचे थे ? सफाई करना वही से क्यों प्रारंभ
किया जहाँ से कंकाल मिला ?
(3) नाली से बरामद खून के धब्बे, कटी हुई हाथ आखिर किसका था?
(4) कंकाल मिलने के साथ ही पुलिस तत्काल जाँच के लिए परिजन पर क्यूँ दबाब बनाना शुरू कर दिया जबकि फोरेंसिक रिपोर्ट आई भी नहीं थी?
(5) अभीतक कंकाल घर के समीप डालने वालों तक पुलिस क्यूँ नहीं पहुँच पाई है ?
(6)
जब से कंकाल मिला है तबसे नवरुणा के सुरक्षित घर लौटने के आश्वासन देने की
वजाए इस प्रकार का माहौल क्यों बनाया जा रहा है कि कंकाल नवरुना का ही है ?
(7) अभीतक नवरुणा के घर लौट आने के दावें करने वाला प्रशासन अचानक कंकाल तक ही अपनी जाँच को क्यों सिमित कर दिया है ?
(8) फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट आने में एक महीने का समय क्यों लगा, जबकि यह महज चंद घंटों या दिनों में हो सकता था ?
(9) फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट परिजनों या मीडिया को क्यों नहीं दिखाया गया ?
(10) जब CID को जाँच का जिम्मा सौंपा गया तो वह लड़की को खोजने की वजाए टेस्ट की बात क्यों कर रही है ?
(11)
जब नवरुणा के परिजन स्थानीय अदालत के आदेश को उपरी अदालत में चुनौती देने
की बात लगातार कर रहे है, फिर पुलिस लगातार दबाब क्यों बना रही है ? अगर
उसे फोरेंसिक रिपोर्ट पर भरोसा है तो वह उपरी अदालत से समान आदेश के
लिए निश्चिंत रहे।
इसके अलावा भी कुछ सवाल है जिनका उत्तर नवरुणा के शुभचिंतक जानना चाहते है :-
(1)
12 वर्षीया नवरुणा के अपहरण की शिकायत दर्ज करवाने के बाद मामले में
तुरंत करवाई क्यों नहीं की गई? करवाई में हुए देरी के लिए किसी को दंडित
क्यों नहीं किया गया या उससे अभीतक पूछताछ क्यों नहीं की गयी देरी होने के
सम्बन्ध में? हो सकता है जाँच में देरी किसी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल
करके करवाया हो! अगर यह पता चल जाए तो अफरंकर्ताओ तक आसानी से पहुंचा जा
सकता है।
(2) क्या प्रेम प्रसंग का मामला बताकर पुलिस मामले को दबाना चाहती थी?
(3) फोरेंसिक जाँच अपहरण के तुरंत बाद क्यों नहीं की गयी जबकि पूरा मामला शुरुआत से ही भूमि विवाद से बताया जा रहा था ?
(4) दिल्ली में सेव नवरुणा कैम्पेन चला रहे छात्रों को धमकाने पुलिस क्यों आई थी और किसके कहने पर आई थी ?
(5) मामले की जाँच कर रहे अधिकारी को बार बार क्यों बदला गया ?
(6) बिहार सरकार का कोई प्रतिनिधि अभीतक पीड़ित परिवार से क्यों नहीं मिला ?
(7) कुछ औपचारिकाताओ को छोड़ दें तो सभी राजनितिक दल अभीतक क्यों चुप्पी साधे हुए है? क्या उनपर दबाब है ?
(8)
बार-बार परिजनों द्वारा सहयोग न करने की बात क्यों कही जा रही है जबकि जो
जानकारी हमें मिली है, उसके मुताबिक वे लगातार पुलिस के संपर्क में है और
हर छोटी-बड़ी जानकारी तुरंत पुलिस से शेयर करते है। आज भी सबसे ज्यादा
यकीन उनका मीठी मीठी बातें करके अबतक झूठी दिलशा देनेवाले एसएसपी पर ही
है।
(9)मुजफ्फरपुर
से लेकर दिल्ली तक के छात्रों को, जो लोकतान्त्रिक तरीके से नवरुणा के लिए
आवाज उठा रहे थे, उनके मुहं बंद करने की कोसिस क्यों की गई पुलिस द्वारा?
(10)
परिजनों ने अपहरण के तुरंत बाद ही भूमि माफियाओं का इसमें हाथ होने की बात
कही और इस अपहरण के मूल को शुरुआत से ही ज़मीन को माना, फिर पुलिस यह सवाल
क्यों उठाती रहती है कि परिजनों ने ज़मीं विवाद की बात छुपाई ।
जब से इस इस केस पर हमने काम करना शुरू किया तबसे लगातार यह सुनने में आता था कि नवरुणा को खोजने के लिए दर्जन भर अधिकारियों को लगाया गया है। पुलिस की टीम ने शहर व आस-पास के जिलों के अलावा दिल्ली, कोलकाता व हावड़ा जाकर जांच की है। नवरुणा व उसके परिवार के हर कनेक्शन को खंगाला गया। कुछ लोग शक के आधार पर पकड़े भी गए। जेल भेजे गए। रिमांड पर लेकर पूछताछ भी की गई। लेकिन अंत में हुआ अभीतक क्या? जबाब है कुछ नहीं।
इन
परिस्थितियों में, पुलिस और राज्य सरकार के नुमयिन्दो को डीएनए टेस्ट न
देने सम्बन्धी परिजनों का फैसला बिलकुल उचित है। पुलिस को टेस्ट देने के
लिए दबाब बिल्कुल नहीं बनाना चाहिए। दबाब की स्थिति में परेशान करने की
शिकायत कोर्ट में दर्ज करवाई जा सकती है। परिजन हमेशा टेस्ट देने की बात
करते है लेकिन वे टेस्ट सिर्फ सीबीआई को ही देंगे, इस बात में दम है। लोगो
को चाहिए कि नवरुणा के बहादुर परिजनों का साथ दे।
पूरी उम्मीद है कि आगामी 25 फ़रवरी को जब सुप्रीम कोर्ट में नवरुणा मामले की सुनवाई होगी तो कोर्ट नवरुणा को तुरंत कही से भी ढूंढ़कर लाने का आदेश देगी। नवरुणा के शुभचिंतक के नाते हम फिर से बिहार सरकार से विनम्र आग्रह करते है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पहले वह बिना देरी किए तुरंत अपहरण के इस मामले को सीबीआई को सौंपे। विश्वास है, नवरुणा के साथ न्याय होगा। हम अंतिम दम तक नवरुणा के न्याय के लिए लड़ते रहेंगे।
दो मीडिया कटिंग साथ में संलग्न है, जो पुरे विषय को समझने में मदद करती है :-
Online Link:- http://www.prabhatkhabar.com/node/237394
डीएनए टेस्ट से क्यों इंकार कर रहे हैं लापता नवरुणा के मां-बाप
दैनिक भास्कर.कॉम | अजय कुमार | Jan 16, 2013, 12:12PM IST
पटना/मुजफ्फरपुर। आखिर क्या वजह है कि अतुल्य चक्रवर्ती और मैत्री चक्रवर्ती अपने ब्लड सैंपल देने से इंकार कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब भले ही किसी के पास नहीं हो, चक्रवर्ती दंपति का कहना है कि उनकी बेटी जिंदा है और पुलिस किसी न किसी तरह उनके खिलाफ ही साजिश कर रही है। अतुल्य चक्रवर्ती खुद अब सुप्रीम कोर्ट जाकर मामले की सीबीआई की जांच कराने की मांग करने वाले हैं।
यह लड़की है मुजफ्फरपुर की नवरुणा चक्रवर्ती। वह पिछले 19 सितंबर से
लापता है। उसे तलाशने की बहुत कोशिश की गयी। लेकिन नहीं मिली। पुलिस की
भूमिका इस लिहाज से हैरान करने वाली रही कि उसने जांच को लेकर विरोधाभाषी
व्यवहार किया। कभी नवरुणा की बरामदगी के लिए पुलिस टीम के गठन की बात कही
गयी तो कभी सीआइडी के जिम्मे मामले को सौंपने की बात कही गयी। हालांकि,
नवरुणा के माता-पिता मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग दोहराते रहे हैं।
नवरुणा की गुमशुदगी के पीछे स्थानीय भूमि माफियाओं की भूमिका कही जाती है।
एडीजी गुप्तेश्वर पांडेय के दो दिसंबर
को इस मामले की सीआईडी जांच की सिफारिश की थी और 15 जनवरी को सीआईडी की टीम
नवरुणा के माता-पिता से पूछताछ के लिए उसके घर गयी। अतुल्य चक्रवर्ती कहते
हैं: इसी से पुलिस की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। पुलिस ऐसे
व्यवहार कर रही है जैसे मेरी बेटी नहीं, सूटकेस गुम हो गया हो और उसकी तलाश
वह कर रही है। इस बीच पुलिस ने नवरुणा के घर के पास से बरामद एक कंकाल को
लेकर जांच की दिशा बदल दी। उसने नवरुणा के माता-पिता का ब्लड सैंपल लेने की
कोशिश की। पर चक्रवर्ती दंपति ने उसे देने से इंकार कर दिया। पुलिस कोर्ट
गयी। कोर्ट ने सैंपल देने का निर्देश दिया। पर नवरुणा के माता-पिता कोर्ट
के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार अपील में चले गये। इस बीच तीन बार पुलिस
मैत्री चक्रवर्ती और अतुल्य चक्रवर्ती का ब्लड सैंपल लेने गयी। हर बार
पुलिस को खाली हाथ लौटना पड़ा। वह कहते हैं कि पुलिस पहले कंकाल मामले पर
फॉरेंसिक रिपोर्ट दे।
अब सवाल उठ रहा है कि सब कुछ के बावजूद
नवरुणा के माता-पिता ब्लड सैंपल देने से क्यों इंकार कर रहे हैं? पुलिस का
संकेत खुद अतुल्य चक्रवर्ती ही जाहिर कर देते हैं। उनका कहना है कि पुलिस
हमें फंसाना चाहती है। वह अपनी नाकामी पर चादर डालना चाहती है।
(न्यूज़ लिंक :http://www.bhaskar.com/article/BIH-why-are-missing-navaruna-parents-refusing-dna-tests-4149996-PHO.html?seq=1)
No faith in State police, Navruna case must be handover to CBI
130 दिन से ज्यादा बीतने के बाद भी नवरुणा का कुछ सुराग पता लगा पाने में बिहार की पुलिस नाकाम रही है। नवरुणा के परिजन, शुभचिंतक शुरुआत से ही बिहार पुलिस की भूमिका संदेह के घेरे में पाते हुए सीबीआई जाँच की मांग कर रहे है लेकिन सरकार इस मांग पर अपनी चुप्पी साधे हुए है। सीबीआई जाँच की मांग सभी राजनीतिक दलों के लोग कर चुके है। स्थानीय विधायक सुरेश शर्मा (देखे-https://www.youtube.com/watch?v=Pef0jQdGOHg ) से लेकर सभी राजनीतिक दल, विशेषकर विपक्ष इस मांग को लगातार दुहराता रहा है कि इस अपहरण की गुत्थी सुलझाने में सीबीआई से ही थोड़ी बहुत उम्मीद बची है इसलिए जल्द से जल्द सीबीआई को जाँच का जिम्मा सौंप दिया जाए। लेकिन सरकार परिजनों, शुभचिंतको की बात तो दूर राजनीतिक वर्ग के भी मांग को अनसुना कर रही है।
राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता व बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष श्री अब्दुल बारी सिद्दीकी ने नवरुणा मामले की जाँच सीबीआई से कराने की मांग 9 दिसंबर को ही की। इस सम्बन्ध में 10 दिसंबर, 2012 को दैनिक हिंदुस्तान में छपी खबर की प्रति संलग्न है :
भाकपा माले के नेता दीपंकर भट्टाचार्य सहित राज्य स्तर के अनेक नेता सीबीआई की मांग दुहराते रहे है। इस सम्बन्ध में 9 दिसंबर की एक रिपोर्ट
इसके अलावा स्थानीय समाजसेवी, यथा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, अग्रणी स्वाभिमान, द्वारा सीबीआई की मांग दुहराया जाता रहा है.
Thursday, 17 January 2013
Wednesday, 16 January 2013
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